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ये कैसा इंसाफ – 2

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Added : 2016-12-17 08:45:38
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वह वापिस लौटा।
‘अब’—वह बोला—‘नेपाली झांग की जगह विलायती विस्की हो जाये।’

‘मेरे लिये नहीं।’—राजेश राझना एकाएक उठ खड़ा हुआ—‘मैं चलता हूँ।’

‘जल्दी क्या है?’

‘मुझे है। सॉरी अब कल मुलाकात होगी।

‘मर्जी तुम्हारी।’—फिर रितेश को भी उठने का उपक्रम करते पाकर वह बोला—‘तुम तो रुको।’

‘मैं भी चलता ही हूं।’—रितेश अनिश्चित भाव से बोला।

‘थोड़ी देर रुको। प्लीज! एकाध ड्रिंक तो मेरे साथ लेते जाओ। फिर बेशक चले जाना।’

‘अच्छी बात है। एकाध ड्रिंक के लिए रुक जाता हूं मैं।’

‘शुक्रिया।’
गुप्ता राजेश राझना को विदा करने के लिए उसके साथ बाहर बंगले के बरामदे तक गया। कुछ क्षण बाद वह अकेला वापिस लौटा

‘चुन्नू!’—वापिस रितेश के करीब पहुंचकर उसने जोर से आवाज लगायी।

जवाब में उसका सफेद बालों वाला अति विशालकाय बूढ़ा नेपाली नौकर ड्राईंगरूम में पहुंचा।

‘विस्की लाओ।—गुप्ता ने आदेश दिया।

चुन्नू तत्काल वापिस लौट गया।
गुप्ता रितेश के करीब आ बैठा। वह कुछ क्षण अपलक रितेश को देखता रहा और फिर धीरे से बोला—‘मेरे माल की सही कीमत आंक कर आज तुमने मेरे ऊपर बहुत मेहरबानी की है। उस मेहरबानी का मैं एक छोटा सा बदला चुकाना
चाहता हूं।’

रितेश ने उत्तर न दिया। उसने ये भी न पूछा कि वो कैसे बदला चुकाना चाहता था। इसके विपरीत वह उसके बारे में सोचने लगा। कैसा आदमी था ये अमलेश गुप्ता जो कि आज से तीस साल पहले अपनी नौजवानी में अपने घर से भाग
कर नेपाल आया था और कुछ अपनी मेहनत से और अधिकतर अपनी चालाकी, बेईमानी और ठगी की अद्भुत क्षमता से जमीन से उठ कर आसमान पर पहुंच गया था। कहने को वो आढ़त का दलाल और हिन्दोस्तानी कपड़े का व्यापारी
था लेकिन हकीकत वो स्मगलरों का शरणदाता और ठगों और उठाईगीरों का सरपरस्त था। भारत के अलावा बर्मा, बंगला देश और थाईलैंड तक में उसके सम्पर्क बताये जाते थे। अपनी आधी जिन्दगी नेपाल में गुजारने के बाद अब वह
अपना तमाम तामझाम बेचकर और बुढ़ौती में एक थाई हसीना से शादी करके हिन्दोस्तान वापिस लौट जाने की तैयारी कर रहा था। अपना मौजूदा बंगला तक वह बेच चुका था। उन जवाहरात की बिक्री आखिरी सौदा था जिसे उसने
अभी थोड़ी देर पहले अंजाम दिया था।

‘अगर’—गुप्ता कह रहा था—तुमने मेरे से बदला उतारने की कोशिश की होती तो मेरे माल की कीमत तुम पचास की जगह चालीस लाख भी लगा सकते थे, पैंतीस लाख भी लगा सकते थे।’

‘मेरी लगायी कीमत मंजूर करना’—रितेश बोला—‘आपके लिये जरूरी नहीं था।’

‘मौजूदा हालात में जरूरी था। मैं कीमत नामन्जूर करता तो सौदा टूट जाता। फिर हिन्दोस्तानी रुपये में कैश डाउन पेमेन्ट करने वाला अपने माल का दूसरा ग्राहक ढूंढ़ने में मुझे महीनों लग जाते जब कि मैं तो इसी हफ्ते यहां से कूच
कर जाना चाहता हूं।’

‘इतना रुपया आप यूं यहां से ले जा सकते हैं?’

‘ले जा सकता हूं। सबको मालूम है मैं अपना बिजनेस; घर बार सब कुछ बेचकर यहां से जा रहा हूं। पूछे जाने पर मैं जवाहरात का नाम भी नहीं लूंगा। पूछे जाने पर यही कहूंगा कि मुझे सारी रकम अपना घर बार, अपना बिजनेस और
उसकी गुडविल बेच कर हासिल हुई।’

‘राझना जवाहरात का क्या करेगा?’

‘पता नहीं। मैंने नहीं पूछा। मुझे अपनी रकम से मतलब है। वो जवाहरात को ले जाकर चाहे दरिया में फेंके। वैसे नेपाल से बाहर उन जवाहरात की कीमत एक करोड़ से ऊपर होगी।’

‘वो जरूर कोई तरीका होगा उसकी निगाह में उन्हें नेपाल से बाहर ले जा सकने का।’

‘हूं!’

‘बहरहाल मैंने तुम्हारी ईमानदारी पर दांव खेला था।’

‘जानकर खुशी हुई’—रितेश शुष्क स्वर में बोला—‘कि एक बेईमान आदमी को, एक ऐसे बेईमान आदमी को जो खुद मेरे से बेईमानी कर चुका है, अब मेरी ईमानदारी की कद्र हुई, उसे उसकी जरूरत महसूस हुई।’

‘व्यापार में ऊंचनीच होती ही है।’
‘जो हरकत आपने मेरे साथ की थी वो व्यापार में हुई ऊंचनीच का नहीं, गुण्डागर्दी, धांधली और साफ बेईमानी का दर्जा रखती है। मेरे साथ पार्टनरशिप का एग्रीमेंट बनवाया, मेरे साइन करने का वक्त आया तो मेरी आंखों में धूल झोंक
कर उसे बदल दिया और मेरे से उस कागज पर साइन करवा लिये जिसके मुताबिक मैं आपका पार्टनर नहीं, आपका मुलाजिम था। ये गुण्डागर्दी, धाँधली और बेईमानी नहीं तो और क्या है।’

‘अच्छे व्यापारी को एक ये भी तो सीख होती है कि वो अपनी आंखें खुली रखे और किसी को उसमें धूल न झोंकने दे!

‘एतबार भी तो कोई चीज होती है!’

‘धन्धे में नहीं होती। होती है तो अमलेश गुप्ता के धन्धे में नहीं होती। मैं भी तुम्हारी तरह होता तो आज भी मैं नंगे पांव, खाली जेब, दो जून की रोटी लिए काठमाण्डू की सड़कों पर दुर-दुर करता फिर रहा होता।’

‘आप बेईमानी को अपनी खूबी बता रहे हैं?’

‘नहीं। वक्त की जरूरत।’

‘मैं आपसे सहमत नहीं।’

‘जाहिर है। तभी तो कुछ दिन पहले आंखों में खून लिए तुम यहां आ धमके थे। मेरा नौकर चुन्नू ऐन मौके पर बीच में न आ गया होता तो उस दिन पता नहीं तुम मेरी क्या गत बनाते। शायद मार ही डालते। बावजूद पीछे हो चुकी
इतनी बड़ी घटना के तुमने मेरे से सहयोग किया, मेरे माल की सही कीमत आंकी, इसके लिए मैं तुम्हारा अहसानमन्द हूं और इसका मैं बदला चुकाना चाहता हूं।’

‘यह आपने पहले भी कहा।’
तभी एक ट्रे पर उम्दा स्काच विस्की, सोडा साइफन और दो ग्लास रखे चुन्नू वहां पहुंचा। उसने ट्रे का सामान सैन्टर टेबल पर स्थानान्तरित किया और खाली ट्रे के साथ वहां से विदा हो गया।

गुप्ता ने विस्की के दो बड़े पैग बनाये।

दोनों ने चियर्स बोला।

‘किसी की’—विस्की का एक घूंट पीने के बाद गुप्ता बोला—‘मेहरबानी का बदला चुकाने की जरूरत समझने वाली किस्म का आदमी मैं नहीं। लेकिन लगता है इस उम्र में हुए इश्क ने और तीस साल बाद अपने वतन लौटने की खुशी ने
मुझे नर्मदिल बना दिया है।’—उसने जेब से एक रंगीन कागज में बंधी पुड़िया निकालकर उसे खोला और खुले कागज को रितेश के सामने किया—‘पन्ना है। दस कैरेट से ऊपर है। एक फैस में जरा से नुक्स है लेकिन वो सैटिंग में छुप
जायेगा। इसकी अंगूठी बनवाकर अपनी होने वाली बीवी को देना। मेरे आशीर्वाद के साथ। लो।’

‘सूम का माल है।’—रितेश कागज समेत पन्ने को थामता हुआ बोला—‘छोड़ूंगा तो नहीं। लेकिन ये न समझिएगा कि इसी में उस धोखाधड़ी और बेईमानी का भी बदला चुक गया जो कि आप मेरे साथ कर चुके हैं। आपकी उस करतूत
के लिए तो मैं जब तक जिन्दा रहूंगा आपकी तत्काल मृत्यु की कामना करूंगा।’

‘पुटड़े!—गुप्ता शिकायतभरे स्वर में बोला—‘मेरे घर में बैठकर, मेरी मेहमाननवाजी कबूलते हुए तो ऐसा बुरा बोल न बोल।’

‘मैं ऐसा ही बुरा बोल बोलूंगा। अलबत्ता आप अपनी विस्की का गिलास मेरे से छीन सकते हैं और मुझे घर से निकाल सकते हैं।’
‘अरे, नहीं। मैं ऐसा क्यों करूंगा। मैं तो तुम्हारे अपने बीच में अमन शान्ति का माहौल देखना चाहता हूं।’

‘वो नहीं हो सकता।’

‘और दो दिन का तो दाना पानी रह गया है नेपाल में मेरा। उसके बाद पता नहीं जिन्दगी में हम दोनों कभी एक दूसरे की सूरत भी देख पाएंगे कि नहीं।’

‘तभी तो इस कोशिश में हूं कि आपको अभी जी भर के कोस लूं।’

गुप्ता हंसा।

‘बहरहाल पन्ने का शुक्रिया। मेरी खुद की औकात तो पता नहीं कब होती इतने खूबसूरत और कीमती नग वाली अंगूठी अनुष्का को भेंट करने की।’—उसने विस्की का गिलास खाली किया और उठ खड़ा हुआ—‘अब मैं चलता हूं।’

‘अरे, एक ड्रिंक तो और लो।’

‘नहीं। मेहरबानी।’

उसने पन्ने को कागज में वापिस लपेट कर पुड़िया अपनी जेब में रख ली और बिना अपने मेजबान से हाथ मिलाने का या उसका अभिवादन करने का उपक्रम किए दरवाजे की ओर बढ़ा।

‘डार्लिंग।’—तभी बाहर बरामदे पर से एक सुरीली आवाज आयी—‘कहां हो!’

फिर दरवाजा खुला और एक अतिसुन्दर, अतिआधुनिक, विलायती परिधानधारी युवती ने भीतर कदम रखा। उसका रंग गोरा था, नयन नक्श बहुत तीखे थे और स्याह काले बालों का सजधज ऐसी थी जैसे वह उसी घड़ी उन्हें किसी ब्यूटी
पार्लर से सैट कराकर आयी थी। आयु में वो लगभग तीस वर्ष की थी लेकिन उम्र से आया ठहराव और शाइस्तगी उसकी खूबसूरती को दोबाला ही कर रहे थे।

वह नैना योसविचित नाम की वो थाई युवती थी जिससे जवान, उम्रदराज, दो बच्चों का बाप अमलेश गुप्ता शादी करने जा रहा था।

‘हल्लो डार्लिंग। हल्लो सोनी!’—वह पहले गुप्ता और फिर रितेश से बोली—‘मैंने डिस्टर्ब तो नहीं किया! मेरे आने से विघ्न तो नहीं पड़ा!’

‘कतई नहीं। कतई नहीं!’—गुप्ता उठकर उसका स्वागत करता हुआ बोला। वह करीब आयी तो उसने बड़े अनुरागपूर्ण भाव से उसे अपनी एक बांह के घेरे में ले लिया।

अपनी नस्ल के लिहाज से नैना खूब लम्बी थी। उसका कद गुप्ता से ज्यादा नहीं तो उसके बराबर जरूर था। कुछ ज्यादा लम्बी वह अपने बालों की वजह से भी लग रही थी। जिसे उसने माथे के ऊपर से गोलाई में घुमाकर सैट करवाया हुआ था।

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