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Agar Khuda Na Kare-6

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Added : 2015-11-21 05:18:49
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कॉफी खत्म करके हम एक-दूसरे का हाथ पकड़े ही कमरे तक वापस आए।

कमरा प्रकाश ने खोला। अंजलि कपड़े पहन चुकी थी। वह सिकुड़ी हुई बैठी थी।
प्रकाश कमर से ऊपर खुला था, उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था।
मैंने उससे हाथ मिलाया और धन्यवाद कहा।

‘अरे भाई साहब, धन्यवाद तो मुझे कहना चाहिए। इतनी अच्छी…’ मैंने उसे बीच में ही रोका और अंजलि की बगल में बैठते हुए उसे अपने से सटाकर उसके कान में कहा- बधाई मेरी जान!!
वह शरम से गठरी बन गई।
मुझे गर्व हुआ, वह मेरी है।

कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद सुषमा ने अनुरोध कर दिया कि वे दोनों बाहर जाकर थोड़ा खुली हवा में फ्रेश हो लें।

सुषमा के साथ का एकांत खास था।
प्रकाश और अंजलि में कोई बात नहीं हुई थी सीधे संभोग हुआ था; यहाँ परिचय की गरमाहट उत्पन्न हो चुकी थी।
शुरू में सुषमा देखने में ही नहीं, बात में भी साधारण लगी थी लेकिन अंजलि का सेक्स कराने में और अभी इस थोड़ी देर के interaction ने बहुत फर्क डाल दिया था।
अंजलि के साथ कुछ जबरदस्ती करनी पड़ी थी, पर सुषमा के साथ तालमेल था, सहयोग था – एक-दूसरे के कपड़े खोलने से लेकर चूमने, सहलाने हर चीज में।

वह मेरी छाती में मुँह घुसाकर मुझे चूमती थी और मैं उसकी पीठ पर रीढ़ के ऊपर के कोमल माँस को महसूस करता था, उसके बालों को सूँघता था, उसके गुलगुले गालों पर होंठों को दबाता था और उसके स्तनों को हाथों में भर लेता था, उसके चूचुकों के बड़े से वृत को मैं अपने होंठों की गोलाई से नापता था और धीरे से उन्हें मुँह के अंदर खींच लेता था।

वह मेरे सिर पर हाथ फेरती थी और मेरी कमर में हाथ डाल मुझे अपने मुँह पर खींच लेती थी, उसकी ‘आ…ह’ की आवाजों में कोमलता और समर्पण थे, उसका माँसल बदन मेरे आकार में ढलकर मुझसे मिलता था।
उसके बदन के अन्य हिस्सों में भी स्तनों को दबाने-सहलाने की किस्म का आनन्द आता था।

हमने एक-दूसरे को होंठों को पिया, बगलों को चाटा, पसीने को सूँघा, कहीं कोई घिन या वर्जना महसूस नहीं की।
हमारे कमर के नीचे कपड़े क्रमशः ही खुले, साए की डोर और पैंट की चेन एक साथ खुले, पैंटी और चड्डी की साथ-साथ विदाई हुई, जैसे दूल्हा और दुल्हन साथ विदा होकर जा रहे हों।
उसने मुझे ‘यू आर लवली’ कहा था और उस वक्त मुझे ‘तुम सुंदर हो’ कहना भी झूठ नहीं लगा था।

जब वह मेरे ऊपर होती थी तो वह मुझ पर छा ही जाती थी और जब मैं उसके ऊपर होता था तो उसका स्वामी, उसको काबू में रखने वाला मालिक महसूस करता था।

स्वाभाविक था कि हम 69 की मुद्रा में उतरते, दोनों में एक दूसरे के लिए कोई हिचक नहीं थी, अपने अपने जीवन साथियों के साथ इसके लिए प्रशिक्षित थे।
उसके भगोष्ठों में भराव और गहराई अधिक थी, उन्हें उंगलियों से फैलाना पड़ता था और मेरे होंठों के चारों तरफ घिराव का एहसास ज्यादा होता था, उनमें मेरे होंठ ज्यादा डूबते थे, उसकी भगनासा भी बड़ी थी, जिस पर होंठ अच्छे से कसते थे।

उसे भी मेरे अपेक्षाकृत छोटे लिंग को चूसने में सुविधा हो रही थी।
यह मिलन के क्षणों में ही उत्पन्न हो जाने वाला प्यार था। सेक्स की क्रिया में वह मुझे और मैं उसे प्यार अधिक कर रहे थे।
मैं एक बार स्खलित होकर धैर्यपूर्वक करने की स्थिति में था जबकि वह अपने कुशल मुख-संचालन से मेरे धैर्य की परीक्षा ले रही थी।

मैं झड़ने की स्थिति में आया तो उसने मुझे रोका नहीं। बल्कि मुँह में और पकड़कर मुझे लिंग बाहर निकालने नहीं दिया, मेरे झड़ने को दौरान वह अपनी कलाई और होंठों से मुझे घर्षण प्रदान करती गई।
यह अपूर्व था।
अंजलि भी इतना दूर बहुत कम ही जाती थी।
कोई अगर जीभ और होंठों की रगड़ देकर लिंग को खींच-खींचकर चूसकर पीता जाए तो इसका आनन्द वही मर्द समझ सकता है जिसे इस सुख को पाने का सौभाग्य मिला है।

मैंने भी उसके चरम सुख के दौरान उसके नितम्बों को कसकर अपने ऊपर दबाए रखा और योनि के अंदर जीभ उतार उतार कर गुदगुदा कर, चूस चाटकर उसे और और झड़ने के लिए प्रेरित करता रहा।
वह मुझ पर मानों कृपा सी बरसाती मेरे मुँह में ‘द्रवित’ हुई।

हम दोनों ऐसे शिथिल हुए कि देर तक एक-दूसरे की जाँघों में ही पड़े रहे। वापस सीधे होने पर लाड़ जताते हुए एक दूसरे के होंठों पर अपने रसों को चखा, चूसा।
मैं जबकि चिंतित था कि अब पुनः स्खलित होने के बाद संभोग कैसे कर पाऊँगा, वह निश्चिंत और खुश थी।

ईश्वर की माया!
यह आपस का विनिमय, बंद कमरे का यह एकांत, आज का यह दिन, यह क्षण सब अद्वितीय थे।
मैंने अंजलि को याद किया और उसके प्रति कृतजता महसूस की… वह राजी नही होती तो यह संभव नहीं होता।
अभी वह प्रकाश के साथ पता नहीं कहाँ क्या कर रही होगी।

मेरे लिए यह विस्मयकारी ही था कि वह मुझे इतना पसंद करेगी। मैं भूल चला था कि मेरी बाँहों में पड़ी यह औरत शुरू में मुझे उतनी पसंद नहीं आई थी। वास्तविक रति के समय आँखों की अपेक्षा त्वचा से मिल रहा अनुभव ज्यादा काम आता है। और इस क्षेत्र में सुषमा अद्भुत थी – सर्वत्र नरम, कोमल, गद्देदार, बिस्तर में उसका व्यवहार भी आत्मविश्वास भर देने वाला था।

बीसेक मिनट की शांति।
सुषमा काफी देर की संचित उत्तेजना के कारण बड़ी तीव्रता से स्खलित हुई थी। उसकी थकान अधिक थी, मैंने भी कुछ देर की झपकी सी ली।
पर दोनों ही उत्सुक थे।

सुषमा के जिस मुख ने मुझे शिथिल बनाया था उसी ने मुझे पुनः जगा दिया। ऐसे मुख में जाकर तो मुर्दे का भी उठ जाता, मैं तो युवा था। मुझे उसने इतना कठोर कर दिया कि दिल की धड़कनें लिंग में गूंजने लगी।
मुझे पूरी तरह से तैयार कर सुषमा ने कहा- देखो तो!
भाले की तरह तना हुआ मेरा लिंग लक्ष्य भेदने को आतुर था।

‘बदमाश कहीं का…’ कहते हुए उसने उसे शरारत से थपथपाया और मेरे ऊपर आने लगी।
पर कमान मैं सम्हालना चाहता था, मैंने उसे खींचकर अपने बगल में लम्बा किया और उसके ऊपर आ गया, जंघाओं को फैलाया और फिर जैसे मक्खन में छुरी उतरती चली गई।
पूर्ण प्रवेश के बाद सुषमा की ‘आ…ह’ के निश्वास ने जतला दिया कि वह इससे संतुष्ट है। वह अंदर बहुत ही कोमल थी – ताजे निकाले गए मक्खन की तरह। महसूस करके मेरा लिंग और फूल गया, मैं सक्रिय हुआ, मैं उसे इतना आनन्दित कर देना चाहता था कि वह भूल न पाए।
वह दूसरे की पत्नी है तो क्या हुआ, मेरा साथ उसे हमेशा याद रहे।

मेरे धक्के तेजी से आक्रामक हो रहे थे। जल्दी ही मेरा आदिम पुरुष मुझ पर हावी हो गया। सुषमा मानों खुशी से किलक रही थी, उसे अनुमान नहीं था कि यह GENTLEMAN इतना कठोर निकलेगा। उसकी ‘आह आह’ मुझे अपनी क्षमता के प्रति ‘वाह वाह’ सी लग रही थी।
मैं जोश से छलक रहा था, नीचे से आनेवाली हर उचकन का जवाब दुगुने जोर की धँसान से देता। परवाह नहीं थी कि मेरे नीचे शय्या उछल रही है या औरत। मैं उसके अंदर लिंग को घुमा-घुमाकर एक-एक कोने, एक-एक सिलवट को सहला रहा था।

मेरे ललाट का पसीना उसके चेहरे पर गिरा तो उसने मुझे पकड़ लिया- रुको अब।
मैं रुकने के मूड में नहीं था लेकिन उसने प्लीज प्लीज कहकर मुझे रुकने पर मजबूर कर दिया।
वह पलटकर मेरे ऊपर आई और मेरे लिंग को अपने अंदर डालती मुझ पर बैठ गई।
गजब का एहसास… सचमुच दो बदन एक जान! वह कुछ देर तक स्थिर रहकर इस एहसास में डूबी रही। फिर अपने को मेरे ऊपर गोल गोल घुमाकर लिंग को योनि में घिसने लगी। वह ऊपर-नीचे हो रही थी और मैं उसमें डूबा लिंग पर उसके चिकने संघर्ष का आराम से आनन्द ले रहा था। जांघों पर गिरते उसके भारी नितंबों के कोमल मखमली भार का मैं भी कमर उचकाकर जवाब दे रहा था।

विपरीत रति का विलक्षण अनुभव… इसमें ज्यादा देर ठहरना संभव नहीं हो पात, लेकिन दो दो स्खलनों के बाद मैं टिक सकता था। सुषमा लेकिन चरम सुख के करीब चली आई थी।
मैंने उसे स्खलित होने से रोका और पलटकर डॉगी स्टाइल में ले आया।
मैं हर विविधता का आनन्द ले लेना चाहता था। परंतु वह थक चुकी थी और मेरे धक्कों को ज्यादा देर झेल नहीं पाई। मुँह के बल ही पड़ गई।

मैंने नितम्बों को ऊँचा करने के लिए उसके नीचे तकिया लगा दिया। अगले कुछ ही धक्को में उसके हाथ-पैर ढीले पड़ गए और वह बेजान गुड़िया की तरह धक्कों से ऊपर-नीचे होने लगी।
मैंने देखा वह निढाल होकर चुपचाप स्खलित हो रही थी। अंजलि का स्खलन अगर उग्र और आवाजों भरा होता था तो सुषमा का शांत और अंतर्मुखी था।

आनन्द का वह चरम क्षण मेरे लिए भी आ पहुँचा, मैंने सुषमा से पूछना चाहा कि ‘कहाँ करूँ…’ पर वह बेसुध थी।
मेरा ज्वालामुखी उसके अंदर ही फूट पड़ा।
स्वैप के लिए आई है, तो तैयार होकर आई होगी! वैसे भी संभोगोपरांत गर्भ निरोधकों की आज कमी नहीं!
मेरा लावा बह बहकर उसके भीतर गर्भ में समाने लगा, मैंने अपने आपको उसके ऊपर शिथिल छोड़ दिया।

यह तीसरा चरम सुख, तीसरा परमानन्द सबसे बढ़कर था। आज पता चला कि दूसरी स्त्री के साथ संभोग का असली सुख क्या होता है। मैं उस आनंदमयी शिथिलता में डूबकर धीरे धीरे अचेत हो गया।

जागने पर घड़ी देख, एक घंटा हो रहा था, सुषमा बाथरूम में थी।
निकली तो गाउन लपेटे!
मैं भी बाथरूम जाकर साफ-सुथरा हुआ।

हमने प्रकाश को फोन लगाया और लौट आने को कहा।

वे लौटे तो प्रकाश सेक्स के एक और दौर के लिए इच्छुक था।
अंजलि जैसी सुंदर स्त्री के लिए क्यों न बार-बार मन चाहे।
लेकिन घर से निकले काफी देर हो चुकी थी और बच्चों के फोन आ रहे थे ‘कहाँ हो मम्मी, जल्दी आओ!’
मेरी इच्छा थी वह एक बार और करवाती पर अंजलि अनिच्छुक थी।

हमने विदा ली, फिर मिलने का वादा किया और लौट आए।
मैं लक्ष्य कर रहा था अंजलि के चेहरे को।
वह गंभीर थी, साथ चलते वक्त मेरा हाथ नहीं पकड़ा, जैसा कि वह हमेशा करती थी, मेरे कुछ पीछे चलती रही, रास्ते भर चुप ही रही।
मैं उलझन में था, कहीं मुझसे नाराज तो नहीं? फिर सोचा, पहले अनुभव का सदमा है, समय के साथ चला जाएगा।
मैंने अपनी खुशी पर ध्यान केन्द्रित किया- कितनी बड़ी चीज घटित हुई है। कितनी बड़ी मनोकामना पूरी हुई है – ईश्वर तेरा लाख लाख शुक्र!

ईश्वर महान है, उसकी कृपा के बगैर इतनी बड़ी बात संभव नहीं – ‘अगर खुदा न करे सच ये ख्वाब हो जाए…’
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