Vasna Ki Na Khatm Hoti Aag- Part 3 - Antarvasna.Us
AntarVasna.Us
Free Hindi Sex stories
Only for 18+ Readers

Vasna Ki Na Khatm Hoti Aag- Part 3

» Antarvasna » Hindi Sex Stories » Vasna Ki Na Khatm Hoti Aag- Part 3

Added : 2016-02-26 00:53:14
Views : 1090
» Download as PDF (Read Offline)
Share with friends via sms or email

You are Reading This Story At antarvasna.us
अपनी कहानिया भेजे antarvasna.us@gmail.com पर ओर पैसे क्माए

अब तक आपने पढ़ा..
वो मुझे देख कर मुस्कुराए और मैं भी दिल की धड़कनों को काबू में करते हुए मुस्कुरा दी।
हम बिस्तर पर बैठ कर बातें करने लगे। मैंने उस दोस्त को बस यही बताया था कि तारा मेरी सबसे अच्छी दोस्त है और उन्होंने भी बस इतना बताया कि वो मुझे प्यार करते हैं और मिलना चाहते थे।
बाकी असल बात क्या है मेरे और तारा के बीच थी और उनके और मेरे बीच थी।
अब आगे..

मैंने उनको देखा.. वो चेहरे से कुछ ज्यादा उम्रदराज नहीं लग रहे थे। उनका बदन भी इतना सुडौल था कि कोई भी एक नजर में कह सकता था कि ये फ़ौज के बड़े अफसर होंगे।

मैंने गौर किया कि उनके चेहरे और आँखों में एक रौनक थी.. ऐसा जैसा कि वो मुझे देख कर कितने खुश हैं।
हम तीनों आपस में बात करने लगे.. पहले तो कुछ देर जान-पहचान हुई।

फिर तारा ने ज्यादा समय नहीं लिया और उनसे उनके कमरे की चाभी मांग कर हमें बोली- आप लोग आपस में बातें करो.. मैं कवाब में हड्डी नहीं बनना चाहती।

वो मुस्कुराते हुए वहाँ से चली गई।

मैं थोड़ी शरमाई सी थी.. पर घबराहट ज्यादा थी.. क्योंकि मैं उनसे पहली बार मिल रही थी और सब कुछ करने की हामी भी भर दी थी।

उन्होंने बातचीत शुरू की.. मैंने भी उनके सवालों के जवाब देने शुरू किए। पहले तो हम अपने घर-परिवार और बच्चों की बातें करने लगे।

फिर धीरे-धीरे एक-दूसरे के बारे में और फिर पसंद-नापसंद और फिर पता ही नहीं चला.. कि कब हम ऐसे घुल-मिल गए.. जैसे हम पहली बार नहीं मिल रहे हों।

अजीब सा जादू था उनके बात करने के अंदाज में..
हमें बातें करते हुए एक घंटा हो चुका था और मेरे दिमाग और दिल से अब अनजानेपन की बात भी निकल चुकी थी।

फिर मैंने उनसे कहा- मैं बाथरूम होकर आती हूँ।
मैं बाथरूम गई और पेशाब कर वापस आकर उनके बगल में दुबारा बैठ गई।

मेरे आने के कुछ देर बाद उन्हें भी पेशाब करने की सूझी.. तो वो भी कर आए और आकर मेरे बिल्कुल करीब बैठ गए।
मुझे उनका हल्का सा स्पर्श हुआ और मेरा दिल जोर से ‘धक्क’ किया..। नाभि के पास एक अजीब सी गुदगुदाहट शुरू हुई और ऐसा लगा जैसे मेरी योनि में जाकर खत्म हो गई।

उन्होंने फिर मुझसे कहा- कितने समय रुकोगी यहाँ?
ये कहते हुए उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया।

मैं घबरा सी गई और पता नहीं मेरे मुँह से ऐसा क्यों निकल गया कि जल्दी कर लो.. मुझे शाम तक जाना है।

इतना सुनने की देर थी कि उन्होंने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया और मेरे चेहरे को एक हाथ से ऊपर उठा के बोला- मुझे लगता है.. जैसे मुझे तुमसे प्यार हो गया और तुम्हें पा लेना चाहता हूँ।
उन्होंने बड़े प्यार से मेरे होंठों को चूम लिया।
उनके होंठों का अपने होंठों पर स्पर्श मिलते ही मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया और मेरी आँखें बंद हो गईं।

उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों से अलग किए.. तो मेरी आँखें खुल गईं और उनसे नजरें मिल गईं.. मुझे उनकी आहों में आग सी दिखाई दी।

मैं झटके से उनके सीने में अपना चेहरा छिपाते हुए उन्हें और जोर से पकड़ते हुए चिपक गई।
हम बिस्तर पर ही बैठे एक-दूसरे से चिपके हुए थे।

जब उन्होंने देखा कि मैं उनसे अलग नहीं हो रही हैं.. तो उन्होंने अपना एक हाथ मेरी जाँघों को पकड़ते हुए मुझे बिस्तर पर घसीटते हुए बीचों-बीच ले आए और फिर उसी हालत में मुझे लिटा दिया।
मैं उन्हें अभी भी पकड़े हुए थी। उन्होंने करवट ली.. मैं पीठ के बल हो गई और वो मेरे ऊपर हो गए।

उन्होंने मेरी तारीफ़ करते हुए कहा- तुम सच में सुन्दरता की मूरत हो।
बस ये कहते ही उन्होंने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और मुझे चूमने लगे।

कुछ समय के बाद उन्होंने मेरे पूरे चेहरे और गर्दन में चुम्बनों की बरसात सी शुरू कर दी और मेरे मुँह से बस लम्बी-लम्बी साँसों की आवाजें निकल रही थीं।
मेरे बदन में कंपकंपी सी शुरू होने लगी थी। मैं भी थोड़ी उत्तेज्जित हो रही थी।

उन्होंने मेरे होंठों को चूसना शुरू कर दिया.. साथ ही अपने हाथों से मेरी साड़ी ऊपर उठाने की कोशिश भी और मेरी नंगी जाँघों पर हाथों को फेरने भी लगे थे।

उनकी जुबान बाहर आ गई और मुझे ऐसा लगा कि जैसे वो अपनी जुबान से मेरे मुँह के अन्दर कुछ ढूँढ़ रहे हों.. मैंने भी अपनी जुबान निकाल दी।
फिर क्या था.. वो मेरी जुबान से अपनी जुबान लड़ाने और चूसने लगे और मैंने भी उनका साथ देना शुरू कर दिया।

हम करीब 10 मिनट ऐसे ही एक-दूसरे को प्यार करते रहे। फिर वो मेरे ऊपर से हटे और मेरी साड़ी को उतारने लगे। मैं भी जानती थी कि वे ये सब क्या कर रहे हैं.. सो मैंने कोई विरोध न करके.. उन्हें सहयोग देने लगी।

मैं अब पेटीकोट और ब्लाउज में आ चुकी थी.. उन्होंने एक झलक मुझे ऊपर से नीचे घूर के देखा और मेरी भरे हुए स्तनों को दोनों हाथों से दबाते हुए मेरे ऊपर झुक कर मुझे फिर से चूमने और चूसने लगे।

अब मैं भी खुल चुकी थी और गर्म होने लगी थी.. सो मैं उन्हें बार-बार जोर से पकड़ती.. छोड़ती और उन्हें पूरा सहयोग देने लगी।

थोड़ी देर यूँ ही मुझे ऊपर से नीचे तक चूमने के बाद वो मुझे अलग होकर अपने कपड़े उतारने लगे।
उन्होंने पूरे कपड़े उतार दिए बस चड्डी को रहने दिया।
उनका बदन तो कुछ खास आकर्षक नहीं था.. क्योंकि वो काफी उम्रदराज थे।

फिर मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगे और ब्लाउज भी निकाल दिया। अब मैं सिर्फ ब्रा में थी और मेरा पेटीकोट भी जाँघों से ऊपर था। इस हालत में देख मुझे उनमें वासना की एक आग सी दिखी।

वो भूखे शेर की तरह मेरे ऊपर टूट पड़े और जहाँ-तहाँ मुझे चूमने लगे। उनके चुम्बनों की बारिश से मैं तड़प गई और मैंने फिर से उन्हें कस के पकड़ लिया।

उन्होंने चूमते हुए अपना हाथ मेरी पीठ पर ले जाकर मेरी ब्रा के हुक खोल दिए और झट से उसे निकाल दिया.. और थोड़ा उठ कर मेरे नग्न स्तनों को ललचाई निगाहों से घूरने लगे।
ऐसा लग रहा था जैसे मेरे भरे-भरे मांसल स्तनों जैसी कोई चीज़ पहले उन्होंने कभी देखी ही नहीं थी।

फिर अचानक से एक झटके में उन्होंने मेरे एक स्तन को हाथ से पकड़ा और उसे मसलते हुए अपना मुँह मेरे दूसरे स्तन पर लगा कर चूचुक को ऐसे चूसने लगे.. जैसे कोई बच्चा दूध पीता है।

मैं सहमी सी उनके इस तरह के व्यवहार को अपने अन्दर महसूस करते हुए मजे लेने लगी। कभी मेरे चूचुक को वो होंठों से भींच कर खींचते तो कभी दांतों से कुतरते।

इसी तरह उन्होंने मेरे दूसरे स्तन को पीना शुरू कर दिया और पहले वाले स्तन को हाथों से दबाने और सहलाने लगे।
मेरी योनि उनकी इन हरकतों से गीली होनी शुरू हो चुकी थी.. पर मैं कोई खुद से कदम उठा नहीं रही थी.. बस उनका साथ दे रही थी।

उन्होंने जी भर के मेरा स्तनपान करने के बाद मेरे पेट को चूमते हुए नीचे मेरी योनि के ऊपर अपना मुख रख दिया और ऊपर से रगड़ते हुए पेटीकोट का नाड़ा खोल कर पेटीकोट को नीचे सरका दिया।

अब मैं सिर्फ पैन्टी में थी और उन्होंने एक बार अपना सर ऊपर उठा कर मेरी पैन्टी की ओर देखा.. शायद उन्हें मेरी मॉडर्न तरह की पैन्टी देख कर ये अचम्भा सा लगा होगा।

क्योंकि मैं अमर की दी हुई पैन्टी के बाद ऐसी ही पैन्टी पहनने लगी थी पतली स्ट्रिंग वाली।

उन्होंने तुरंत फिर मेरी पैन्टी के ऊपर से योनि.. जो फूली हुई दिख रही थी उस पर हाथ फेरते हुए होंठों से चूम लिया और सहलाते हुए मेरी पैन्टी को किनारे सरका कर मेरी योनि खोल दी और उसे चूम लिया।

मैं एकदम से सिहर गई और ऐसा लगा.. जैसे पेशाब की पतली सी तेज़ धार निकल गई हो.. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं था.. बस वो मेरे जिस्म की एक सनसनाहट थी।

आगे इस वासना की आग को भड़कते हुए पढ़ने के लिए अन्तर्वासना से जुड़े रहिए।
कहानी जारी है।
saarika.kanwal@gmail.com

» Back
2016 © Antarvasna.Us
Kamukta, Hindi Sex Stories, Indian Sex Stories, Hindi Sex Kahani, Desi Chudai Kahani, Free Sexy Adult Story, New Hindi Sex Story